पार्क

वक़्त शाम का ही रहता हमेशा

मुलाक़ात रोज़ होती, हो भले ही 5 मिनट!

हाल-चाल कभी एक दूसरे के पूछे हुए याद नहीं

बातें होती तो सिर्फ़ इधर उधर की, बेवजह सी

पार्क में बरगद के पेड़ के नीचे बैठ कर बतियाने का आनंद ही कुछ और हुआ करता

‘मिटली’ नाम की एक 10-11 साल की लड़की रोज़ उनकी ओर मुस्कुरा कर देखते हुए अपनी साइकल पर बग़ल वाली गली से गुज़रा करती

‘मंकु राम’ भी अपनी मिठायी की दुकान में बैठे बैठे दोनों को ग़ौर से देखा करता और मन ही मन अपनी जवानी के दिन याद कर के मुस्कुरा लिया करता

‘चम्पा देवी’ पार्क में ठीक शाम 7 बजे सैर करने निकलती और कम से कम 5 चक्कर लगाए बिना घर की ओर नहीं मुड़ती। जितनी बार भी वो उनके क़रीब से गुज़रती, अजीब सा चेहरा बना के फुर्ती से पाँव चलाने लगती और कुछ क़दम चल कर उन्हें फिर से मुड़ कर देखती।

इस्त्री करता हुआ ‘रामानन्द’ और उसका बेटा ‘बाला’ अपनी ही धुन में मग्न रहते कि बस अँधेरा होने से पहले काम ख़त्म कर के घर की ओर रवाना हों। इसलिए वो उन दोनों पर ज़्यादा ध्यान नहीं दे पाते।

‘अपेक्षा’ सैर करने के बहाने घर वालों से अपना फ़ोन छुपा कर पार्क में दौड़ी चली आती और कोने वाली बेंच पर बैठ कर अपने ख़ास मित्र से ख़ूब बतियाती। उसको ये भी बताती कि यहाँ आजकल लड़का-लड़की साथ बैठ कर आराम से बातें करते हैं और फ़रमाइश करती कि वो भी आए, उससे मिले।

‘चिंटू’ और उसकी अंडर 8 फ़ुट्बॉल टीम खेल का आनंद उठाते और कभी-कबार जान-बूझ कर बॉल उन दोनों की तरफ़ मारते। ख़ैर उनको बॉल तो वापिस मिल जाती मगर वो शैतान बच्चे ये शरारत फिर से करते, जब तक कि उनकी माताएँ उनको कान पकड़ के ले जाने नहीं आ जातीं।

मच्छरों की फ़ौज अब पार्क में हर जगह फैल जाती और वो दोनों बात करते करते उठ कर बिना ‘फिर मिलेंगे’ कहे अपने अपने घरों की ओर निकल जाते।

ये सिलसिला अगली शाम फिर जारी रहता

काफ़ी सालों बाद वो पार्क आज भी उनकी कमी महसूस करता है!

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